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समीक्षा - कलसी का पानी

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किताब का नाम है- "कलसी का पानी" इसकी लेखिका हैं - "तृप्ति अग्रवाल" ये बहुत ही प्यारी कविताओं का एक संग्रह है। इस किताब की एक ख़ास बात ये है कि लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में दर्ज तृप्ति जी की सूट पेंटिंग्स भी इस किताब में देखने को मिलती है किताब के कवर के साथ साथ अंदर भी कई अद्भुत सूट पेंटिंग्स है जो तृप्ति जी के द्वारा बनाई गई है। कला और साहित्य दोनों ही क्षेत्र में प्रखर तृप्ति जी ने चार भागों - कृष्णागी, अग्निसुता,वीरिणि और प्रज्वाला में अपनी कविताओं को पुस्तक में संकलित किया। जिसमें नारी, बेटी, माँ, कलाकार, विवाह, कन्यादान और प्रेम का चित्रण किया है। शुरुआत की ये दो पंक्तियाँ बेहद प्यारी लगी " नहीं किसी की नही हूँ मै, न है मेरा कोई नाम। बस हूँ अपनी, बसी युगों में, अपने अन्तरधाम!" कविताएं कुछ ऐसी जो दिल को छू जाएं। लिखने का तरीका और शैली बहुत आकर्षक है। काफी सोच समझ कर इस काव्य संग्रह को सजाया गया है। अच्छे सुंदर साहित्यिक शब्दों का प्रयोग है। बार बार पढ़ी जा सकती है ये किताब। ⭐⭐⭐⭐

साँझी की समीक्षा

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आशुतोष तिवारी जी द्वारा - साँझी - एक अधूरी कहानी : एक संक्षिप्त अनुभव                     "प्रेम हमारे समाज में 'पाकड़' का वह वृक्ष है जिससे छाया की अपेक्षा तो सब करते हैं लेकिन कोई उसे अपने आंगन में लगाना पसन्द नहीं करता। प्रेम के किस्से सुनना सबको पसन्द है और उस कहानी के प्रेमी जोड़ों से सहानुभूति भी होती है लेकिन यदि एक प्रेम कहानी हमारा प्रश्रय माँगने लगे तो सबसे बड़ा निंदक भी यह समाज ही होता है। प्रेम को आदर्श बताकर उसका पाठ पढ़ाने वाले समाज को प्रेम के यथार्थ के धरातल पर प्रसन्न हो जाने वाला प्रेमीजोड़ा अपना सबसे बड़ा शत्रु और विद्रोही लगने लगता है। समाज की इसी प्रवंचक विचारधारा को परत-दर-परत खोलती प्रतीत होती है 'साँझी एक अधूरी कहानी' ।                     यह 'लम्बी कहानी', हाँ लम्बी कहानी ही क्योकि यह उपन्यास के धरातल पर तो खरी उतरती नहीं दिखाई पड़ती है, पूरी तरह से उस स्त्री के अपने जीवन के प्रति अविश्वास और संदेश की भावना से ओतप्रोत है जो रूढ़िवादी और तथाकथित छद्म परम्पराओं के खूंटे से बंधी हुई समाज व्यवस्था और परिवार के भीतर स्वयं की स्थिति क

उम्र एक जरिया है जज करने का

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असल में किसी को जज करने के लिए उम्र एक जरिया तब बन जाती है जब वो बार बार दोहराई जाए। पिछले छ महीनों में मेरी किताबों से ज्यादा तो मेरी उम्र का प्रचार हुआ है। क्योंकि न्यूज का टाइटल यही रहा 20 वर्ष की उम्र में लिखी पाँच किताबें। तारीफें मिली लेकिन उससे एक चीज बदल गयी। जो लोग मुझे अभी तक 24 25 कि उम्र का समझते थे। अब वो बालिका, दादी अम्मा जैसे शब्दों से नवाज़ने लगे है। 🤣🤣🤣 तो उन कथित बुद्धिमानों को लगता है कि ये तो बच्ची निकली🤦 और वे तारीफ की आड़ में नीचा दिखाने की कोशिश करने लगते है। तो क्या उम्र एक दायरा तय कर देती है कि इज़्ज़त किसकी करनी है किसकी नही?? तो जरूरत तब इस बात की होती है कि उन चंद लोगो को निकाल फेंकने की बजाय उन्हें देखने दो। आगे वक्त आएगा जब मैं आज से बेहतर कर के दिखाऊँगी😎😎

सोशल मीडिया बन रहा न्यायालय

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कुछ दिन पहले गुरुग्राम में एक लड़के ने आत्महत्या कर ली। लोग कह रहे है वो 17 साल का था। जानते है क्या हुआ उसके साथ?? एक लड़की ने इंस्टाग्राम पर स्टोरी डाल कर लोगो को बताया कि इन लड़के ने 2 साल पहले उसे molest किया। उस लड़के का नाम भी लिखा - manav singh. इस बहन के पर कोई सबूत नही था। 2 साल लगा दिए उसने इस बात को बाहर लाने में। अगर सच मे उसके साथ ऐसा हुआ था तो उसे पुलिस के पास जाना था। खुद जज बनने की क्या जरूरत थी। उसके बाद उस लड़के के पास कई लोगों की धमकियां जाने लगी उसे डराया जाने लगा। परेशान होकर उसने 11वे माले से कूद कर आत्महत्या कर ली। इसके बाद वो लड़की बोली कि अगर उसने प्रेशर में आकर जान दे दी तो इसमें मेरी गलती नही है। गलती तेरी नही है बहन गलती इस समाज की है जो कभी इस तरफ़ लुढ़कता है कभी उस तरफ। अगर लड़के ने ऐसा कुछ किया था तो उसे सजा दिलवाती। और अगर उस लड़के ने कुछ नही किया तो इस लड़की को सजा कौन देगा? मैंने दोनो पहलुओं पर किताबें  लिखी है। पीड़िता पर भी और फेक फेमिनिज़्म पर भी। और रही बात जजमेंट की तो लड़की ने खुद अपना मामला सोशल मीडिया पर परोसा। उस 15 साल के लड़के ने अपने से बड़ी लड़की को मोलेस्

मेरी प्यारी दादी माँ

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जाने कितने संघर्षों में उन्होंने हमें पाला था वो दौर ही ऐसा था जब खुशियों पर ताला था मां के जाने के बाद दादी गोद में सुलाती थी हर ख्वाहिश पूरी कर हाथ से खाना खिलाती थी जाने कैसे दिन थे वो कई रात जागते बिताती थी हर मुश्किल कठिनाई से हम बच्चों को बचाती थी उस सूने से घर में काली रातें काटा करती थी हम बच्चों की खातिर हर बोझ लादा करती थी घर में सब कुछ था किस बात की कमी थी परिवार तो पूरा था मां के जाने की गमी थी धीरे-धीरे हमने यूं ही जीना सीख लिया दादी मां के आंचल में लिपटकर सोना सीख लिया हमें पाल पोस कर बड़ा किया इस कदर समझदार बनाया हर मुश्किल से लड़ सके खुशियों का हकदार बनाया आज मेरा अस्तित्व है तो सिर्फ दादी के कारण जो भी मेरा व्यक्तित्व है वो सिर्फ दादी के कारण मुझे हर सीख दी है जीने की राह बताई है मेरे हर गलत कदम पर हमेशा चिंता जताई है मुझे यूँ काबिल बना दिया कि कठिनाईयों से लड़ सकूं हर तकलीफ पार कर एक अच्छा इंसान बन सकूं - शिवांगी पुरोहित

परेशानी में है प्राइवेट बैंक के कर्मचारी

जहां देश कोरोनावायरस महामारी से जूझ रहा है वहीं प्राइवेट बैंक के कर्मचारी भी बहुत परेशानियों का सामना कर रहे हैं।पहले सरकार ने बैंकों को सिर्फ लेनदेन करने और पासबुक में एंट्री करने जैसे अनिवार्य कार्य ही करने को कहे और घर से काम करवाने को कहा लेकिन अब सरकार ने 33% स्टाफ के साथ कार्य करने को कह दिया है। वही प्राइवेट बैंक के अधिकारी उनके कर्मचारियों को टारगेट पूरा करने का दबाव बना रहे हैं। उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि देश एक बहुत गंभीर परेशानी से जूझ रहा है जिसका निवारण कब होगा यह किसी को भी नहीं पता। लेकिन यह प्राइवेट बैंक वाले अधिकारी अपना बिजनेस बढ़ाने की कोशिश में है। इन्हें कोई फिक्र नहीं है इनके कर्मचारियों की। अगर सरकारी बैंक को एक तरफ करें तो यहां सिर्फ लेनदेन जैसे कार्य हो रहे हैं। और सरकारी बैंक के कर्मचारियों की नौकरी तो फिक्स है। लेकिन प्राइवेट बैंक के कर्मचारी एक अनिश्चित नौकरी कर रहे हैं। अगर वे टारगेट पूरा नहीं करेंगे तो उन्हें उनकी नौकरी जाने का भी डर है और साथ ही साथ अधिकारी उनकी सैलरी काट लेने की भी धमकियां दे रहे है। इस दबाव के चलते वे बहुत ही मानसिक प्रताड़ना और

समझौता

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बालकनी में सुबह की हल्की हल्की धूप आ रही थी। अनुराधा जी कुर्सी पर बैठी चाय पी रही थी और उनके पति साथ बैठकर चाय के साथ अख़बार पढ़ रहे थे। उनका बेटा और बहु दोनों अपने अपने टिफिन ले कर ऑफिस जा चुके थे और पोता राहुल भी स्कूल चला गया था।अनुराधा जी चाय खत्म करके उठी और रसोई में जाकर दोनों का खाना बनाने में जुट गयी। यह उनका रोज़ का काम था उन्हें अपना और पति का खाना स्वयं ही बनाना पड़ता था। अपनी उम्र के हिसाब से अनुराधा जी को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। दोनों का खाना बनाना और राहुल के स्कूल से आने पर उसकी देखभाल करना। कभी कभी बेटा और बहु ऑफिस से लेट आते तो शाम का खाना भी उन्हें भी बनाना पड़ता था। कई बार बहु बहाने से पति और बेटे के साथ पिक्चर देखने या होटल में खाना खाने चली जाती। कभी सास या ससुरजी से बाहर खाने पर जाने का आग्रह नही किया। यदि बेटा उन्हें साथ ले जाना भी चाहे तो भी पत्नी के डर से कह नही पाता था। अनुराधा जी इस सब का विरोध नही कर पाती थी क्योंकि उन्होंने अपनी ज़िन्दगी डर डर के ही बितायी थी। 16 की उम्र में ही उनकी शादी हो गयी थी। शादी के बाद जब वो गांव वाले घर में पहली बार आई थी तो सोचा करती